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सोमवार, 3 अप्रैल 2023

बाज़ का पुनर्जन्म /जीवन का कायाकल्प

 

बाज़ का पुनर्जन्म /जीवन का कायाकल्प

    बाज़ का जीवनचक्र मनुष्य के लिए हमेशा से प्रेरणादायक रहा हैं। बचपन से मादा बाज़ के द्वारा कठिन ट्रैंनिंग से उसके जीवन की शुरुवात होती हैं। और वो आसमान पर राज करता हैं।  अपने से 10  गुना वजनदार पशु पक्षियों का शिकार पलभर में  करना।  मिनटों में बादलों को चिर के ऊपर जाना।  कई  घंटो तक बिना पंख हिलाये आसमान की ऊंचाइयों पे उड़ते रहना  आमतौर पर यह सब मनुष्य के सपने होते हैं। 

        बाज़ जब अपने जीवन की व्रद्धावस्था में आता हैं तब उसके जीवन में मुश्किलें आना शुरू होती हैं।  यह मुश्किलें उसकी पंजो की पकड़ का कमजोर होना, उसकी शिकार के जो चोंच काम में लेता हैं। उसका अधिक मुड़ जाने के कारण शिकार करने में असाहय होना। और जिन मजबूत पतले और लम्बे पंखो से वो आसमान पर राज करता हैं उनका उसकी छाती से चिपकना और भारी हो जाना।  

       ये कठिन परिस्ठितिओ में उसको आगे का जीवन जीना बहुत ही मुश्किल हो जाता हैं। ऐसे में उसके पास अधिक विकल्प बचते नहीं हैं।       

यह सही हैं की  भोजन जुटाने के लिए उसे पंख,चोंच और पंजों की मुख्य आवश्यकता होती हैं।  इनके कार्य नहीं करने के कारण बाज़ निश्च्चित  ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा. दूसरा यह भी हो सकता हैं की वो अन्य पशु पक्षियों के द्वारा शिकार किये हुए व उनके द्वारा छोड़ा हुआ भोजन से वो अपनी शेष जीवन को जिये और या वो अपनी इन तीनो अंगो को कायाकल्प कर पुनर्स्थापना करें।  ऐसे में बाज़ ने जैसा जीवन जिया होता हैं उसी को जीने का साहस भरता  हैं। और बाज़ अपने आस पास की ऊँची पहाड़ी की चोटी पर चला जाता हैं। तब उसके जीवन की सुधार (reforming) की प्रक्रिया शुरू होती हैं। 

       बाज़ पहाड़ी पर अपनी चोँच को पथरो पे मार मार के तोड़ देता हैं और इस दौरान वह  लहू लुहान हो जाता हैं। इसी प्रकार वह अपने पंजों को पथरो पर रगड़ रगड़  के घिस देता  हैं। जब उसके चोंच और पँजे  नए आजाते हैं तब वह अपने भारी और कमजोर हो चुके पंखो को नोंच नोंच के अलग कर देता हैं। इस दौरान वह घायल भी हो जाता हैं। अन्तत 6  महीने के बाद वही बाज़ एकबार फिर से नए पंखो,चोँच और पंजों के साथ आसमान में उसी गति से अपने जीवन का सफर शुरू करता हैं।  मनुष्य क के लिए बाज़ बहुत बड़ा प्रेरणादायक पक्षी हैं।  

मानव जीवन को भी समय समय पर परिवार,समाज,व्यवसाय,कार्य, दिनचर्या,व्यवहार और सोच को पुर्नस्थापित करने की आवश्यकता होती हैं। .....Read More

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2023

एक किसान व चार चोरों की कहानी।

"दुबारा पंगा नहीं लेने की सौगंध"



यह कहानी हैं एक किसान परिवार एवं चार चोरों की। 

एकबार की बात हैं की एक गांव के एक छोर पे एक गरीब किसान परिवार रहता था। ताजा ताजा बारिश हुई थीं और बाकी लोग अपने खेतो में काम करने की तैयारी में लगे हुए थे।यही किसान चारपाई पे बैठा बैठा सोच रहा था। तभी किसान की पत्नी ने देखा की वो चिंता की मुद्रा में हैं। उसने किसान से पूछा की क्या बात हैं,तब किसान ने बताया की फिर हमे किसी से बैल उधार में लेने होंगे खेती के लिए और जिससे भी लेंगे वो पहले अपनी खेती पूरी करेगा और उसके बाद ही कोई सहायता करेगा और हमारी फसल की जुताई में देरी के कारण फिर से पिछले वर्ष की भांति अनाज की पैदावार कम होगी। काश अपने पास अपने बैल होते ।यही सब सोच के परेशान था। किसान पत्नी ने बताया की उसके पास उसके मायके वालों ने जो गहने दिए थे उनको बेच के आप अपने 2 बैल खरीद लो। और जब हमारी फैसले अच्छी होंगी उससे हमे आमदनी होगी और हम फिर से गहने बनवा लेंगे। इस प्रकार से किसान ने 2 हस्टपुष्ट बैल खरीदे। और परिवार में बड़ी खुशी का माहौल होगया। 


    किसान अपनी पत्नी के साथ खेत में जुट गया और खेत को साफ करके हल जोतना शुरू कर दिया।उसकी पत्नी उसे खेत में ही भोजन लेके जाति और खुशी के साथ वो अपने काम में लग गए। एक रोज क्या हुआ की किसान खेत में हल जोत रहा था तभी उसके पड़ोस के खेत से दूसरे किसान ने उसको आवाज दी और कहा की उसकी पत्नी चाय लेके आई हैं इसलिए वो भी थोड़ी चाय पी ले और इस बहाने थोड़ा आराम भी मिल जायेगा और बैल भी थोड़ा आराम कर लेंगे । किसान ने बैलों से हल को अलग करके और चाय पीने चला गया। दोनो पड़ोसी आराम से चाय पीते हुए अपनी बाते करते हुए कब 2 घंटे बीत गए पता ही नही चला। तभी किसान ने कहा की अब उसे जाना चाहिए और अपने काम पे लग जाना चाहिए। जैसे ही किसान अपने खेत में पहुंचा तो देखता हैं की उसके दोनो बैल खेत में नही हैं। किसान ने बैलों को इधर उधर खोजा पर बैल नही मिले। सांय का समय होने को था और भोला भाला किसान बड़े दुखी मन से उदास होकर अपना हल कंधे पर उठाए घर पहुंचा। 


   उसको बिना बैल के देख के उसकी पत्नी ने बैलों के बारे में पूछा तो किसान ने सारी घटना विस्तार से बताई। उसकी पत्नी तुरंत खाना बनाकर किसान व बच्चो को खिलाके उन्हें आराम करने को कहा और खुद ही बैलों को खोजने के लिए चल दी। और खेत से बैलों के पैरो के निशान (खोज) देखते हुऐ बढ़ती रही। बहुत अधिक मील पैदल चलते चलते उसको बहुत रात हो गई। तभी उसने रुकने के लिए एक सराय (पुराने समय की होटल) में पहुंची तो देखती हैं की उसके बैल खूंटे से बंधे हुए हैं और चार चोर रुके हुऐ हैं। चोरों ने उससे पूंछा तो उसने बताया की वो राहगीर हैं इसलिए रात्रि विश्राम के लिए रुकी हैं। आपस में बात करते हुए सबने भोजन की चर्चा की तो किसान की पत्नी के कहा की उसके पास कंगन हैं वो बनिए की दुकान से सामान ले आती हैं और भोजन मिलजुल के बना लेते हैं यह आइडिया चारो चोरों को अच्छा लगा । किसान की पत्नी ने बनिए के पास गई और बताया की उसको राशन चाहिए उसके बदले वो बैल दे देगी। तभी मोल भाव किया तो बनिए ने कहा की दोनो ही बैल उसे दे दे तो अच्छी कीमत देगा। किसान की पत्नी ने तेज आवाज लगाई और चोरों से पूछा की एक बेच दू की दोनो ही बेच दू तभी उन्होंने कहा की दोनो ही बेच दो। उसने दोनो बैलों के पैसे बनिए से लिए और उसमे से कुछ राशन खरीद कर ले आई। और भोजन बनाया और बातचीत करके सभी लोग सो गए। बातचीत में चोरों ने उसे बताया की वो सभी रेलवे लाइन पे बहारामाशी का काम करते हैं और वो अपने गांव से दूर एक बूढ़ी महिला के घर में रहते हैं और उनके पास बहुत धन हैं।। जब सभी गहरी नींद में सो गए तो किसान की पत्नी उठी और दबे पांव अपने घर वापस आ गई।


 जब सुबह चोर जगे तो देखते हैं 

की वो औरत नही हैं तभी वो अपने नित्यकर्म से फ्री होके अपने बैलों को लेकर चलने लगें तभी बनिए ने उन्हें रोका और कहा की वो बैल तो उसने खरीद लिए हैं। रात्रि में उस औरत ने आपसे पूंछा भी था की एक बेचना हैं या दोनो तभी आपने दोनों के लिए कहां था। तभी चोरों को कंगन का माजरा समझ में आ गया । अब चोर अपने आपको एक महिला के हाथों ठगा महसूस कर रहे थे। तभी उन्होंने उससे बदला लेने की ठानी और वो सभी उस गांव की तरफ चल दिए। पर उन्हें किसान के घर का पता नहीं था। इसलिए उन्होंने प्लान किया की उसकी पत्नी पानी लेने को जोहड़ में आएगी तो वो लोग उससे पहचान लेंगे और उसका पीछा करके उसके घर के बारे में पता कर लेंगे और उन्होंने ऐसा ही किया। पर ये करते हुए किसान की पत्नी ने उनको पहचान लिया और समझ गई की ये चोर बदला लेने के लिए आए हैं। चोरों ने रेकी करके रात्रि होने का इंतजार किया और वापस जोहड़ के पास झाड़ियों में आके बैठ गए। इसी बीच किसान की पत्नी अपने गांव के नाई (बार्बर) के पास गई और उससे उस्तरा (सेविंग करने का धारदार औजार) लेके आगाई और खाना खिलाके किसान व बच्चो को सुला दिया और खुद अपने घर की एक खिड़की जिसमे इंसान की मुंडी (सर) अंदर जा सके उसके पास रोशनी करके छिप के बैठ गई। जैसे ही अंधेरा हुआ वो चारों चोर उसके घर के चारों ओर घर में परवेश करने की जगह तलासने लगें तभी उन्हें उस खिड़की के पास रोशनी दिखाई दि और वो उसके पास पहुंच गए। एक चोर जो अधिक सक्रिय था ने अपनी गर्दन उस खिड़की के अंदर की और शेरनी की भांति किसान की पत्नी घात लगाकर कर बैठी थी उसने तुरंत उस्तरे से उसकी नाक को काट दिया। चोर को समझ नही आया। और वो चिलाने लगा की उससे मधुमक्खी ने काट लिया हैं चूंकि वन्हा पे अंधेरा था इसलिए दूसरे चोर ने उसे कमजोर कहा और खुद अपनी गर्दन अंदर झांकने के लिए घुसा दी और उसकी भी नाक को काट दिया और वो भी चिलाया की यन्हा पे तो सच में खतरनाक मधुमक्खियां हैं। तभी तीसरे चोर ने अंदर गर्दन दी और उसकी नाक कटी तो उसनें कहा की ये पीले वाले ततये हैं सब को कमजोर देखते हुए चौथे चोर ने अपनी गर्दन अंदर दी और जैसे ही उसकी नाक कटी वो जोर से चिल्लाया की उसकी नाक कट गई तभी सबने बारी बारी से कहा की उनकी भी नाक कट गई है। सभी दुखी होकर व हार मानके वापस अपने घर चले गए। 

कुछ दिन के अंतराल के बाद


एकदिन किसान की पत्नी ने चूरमा के बड़े बड़े पिण्ड बनाए और उनके अंदर उन चोरों की नाक को डाल दिया। वो उनको ढूंढते हुऐ उनके घर पहुंच गई। और बूढ़ी मां को बताया की वो उनकी बहिन हैं और उनसे मिलने के लिए आई हैं। बूढ़ी मां ने बताया की वो सभी काम पे गए हुऐ हैं। उसने बूढ़ी मां से उनकी रग (to know the detail about that ) ली तो बूढ़ी मां ने सब कुछ बता दिया की वो कितना कमाते है और घर में किधर किधर छुपा रखा हैं। तभी उसने कहा की वो आराम करे और में उनको बुला के ले आती हुं। जाते वक्त किसान की पत्नी ने बूढ़ी मां को वो चूरमे के चार पिण्ड भी दे दिए ताकि उसके भाई वापस आते समय खाते हुए आयेंगे तो उसको बहुत खुशी होगी। और बूढ़ी मां चली गई पीछे से किसान की पत्नी ने सारा धन इकट्ठा किया,और वहां से तुरंत रवाना हो गई। जब बूढ़ी मां ने जाके उनको बहन के आने की जानकारी दी तो आश्चर्य में पड़ गए,क्योंकि उनकी कोई बहन थी ही नहीं। वो अपनी बूढ़ी मां के साथ अपने घर की और बढ़ने लगे तभी मां ने उनको लड्डू (चूरमे के पिण्ड) खाने को दिए और वो उसका स्वाद लेते हुए चल रहे थे तभी एक के पिण्ड में वो कटी हुई नाक मिली और सबने देखा की वो सबके पिण्ड में थी वो समझ चुके थे। वो तुरंत घर पहुंचकर देखते हैं,की उनका छुपाया गया सारा धन गायब था। वो सभी दौड़ते हुऐ उसके पीछे चले दिए। चलते चलते रात्रि हो गई और जंगल भी आगया था। 


   इसलिए उन्होंने सोचा की उन्हे यन्ही पे रुक के आराम करना चाहिए। और एक बड़े बरगद के नीचे एक महात्मा का धुना था उसी जगह आराम करने लगे। क्योंकि जंगल में जानवर थे इसलिए 3 लोग सोएंगे और एक चोर जानवरों का ध्यान रखने के लिए जागता रहेगा ,ऐसा सभी बारी बारी से करेंगे। मध्यवरात्री में एक चोर जो जगा हुआ था उसने देखा की बरगद के पेड़ पर कोई महिला दिख रही हैं तो उसने उससे पूछा की आप कोन हो तो महिला ने बताया की आसमान से पटकी और पेड़ पे अटकी एक दुखियारी हैं और इस संसार में उसका कोई भी नही हैं। यह बात सुन कर चोर के मन में दया का भाव जगा और उसने उसे विवाह का प्रस्ताव दिया जिसे उसने स्वीकार कर लिया तभी चोर ने कहा की आप नीचे आजाओ लेकिन महिला ने उसे ऊपर आने के लिए आग्रह किया । और वो चोर अपने साथियों को सोए हुए छोड़ के बरगद के पेड़ पर चढ़ गया। और कहा की हम यान्हा पर शादी कैसे करेंगे तभी किसान की पत्नी ने कहा की हम एक दूसरे की जीभ से होठों को किश करेगें और प्रेम के पवित्र बंधन में बंध जाएंगे। तभी किसान की पत्नी ने पहले जीभ निकाली और उसके होठों को किश किया। फिर चोर को भी ऐसा करनें को कहा तो चोर ने जीभ बाहर निकाली की उसने उस्तरे से उसकी जीभ को काट दिया अब क्या था ।चोर अपना संतुलन खो कर नीचे महात्मा के धुने (राख) में आके गिरा। अंधेरे के कारण सभी चोर डर के मारे भागने लगे उनके पीछे जीभ कटने के कारण तुतलाता हुए चोर दौड़ रहा था रु -रु -रु -को -को-रुको रुको पर वो डर के मारे दौडे जा रहे थे। पूरी रात वो एक उन तीनो के पीछे दौड़ता रहा । जब सुबह हुई तो उनमें से एक ने पीछे मुड़ के देखा तो उनका साथी ही पीछे दौड़ रहा था । महात्मा के धुने में गिरने के कारण वो राख से पहचान में भी नही आ रहा था। इस प्रकार से चोरों ने अपनी जिंदगी का कमाया हुआ धन व नाक खोने के बाद जिंदगी में दुबारा कभी चोरी नही करने की सौगंध ली । और अपने अपने रास्ते चलते बने। इस प्रकार से किसान की पत्नी ने चोरों को सबक सिखाया और फिर खुशी खुशी रहने लगे। ।। Read More......

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023

बकरी व चील की कहानी

 "सहायता करना गलत नहीं पर चुनाव सही होना जरूरी हैं अन्यथा अपने ही पर कुतरावा दोगे"

एक बार एक जंगल में एक शेर अपने परिवार के साथ  रहता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी के साथ 2 बच्चे भी थे। एक बार क्या हुआ की शेर व परिवार को भोजन किए 2 से 3 डिंबका समय बीत गया इसलिए शेर ने शेरनी से कहा की आज तो शिकार करने के लिए चलना होगा। और वो अपनी गुफा में दोनो बच्चो को छोड़ के शिकार के लिए दूर निकल गए। क्योंकि बच्चे को बहुत भूख लगीं हुई थी इसलिए वो गुफा के बाहर शेर व शेरनी का इंतजार कर रहे थे तभी उधर से एक बकरी गुजर रही थी। बकरी ने देखा की शेर के बच्चे भूख के मारे तड़प रहे थे इसलिए उसे दया आई और उसने दोनो बच्चो को अपना दूध पिलाया। कुछ देर बाद दोनो बच्चे शांत होगए और आपस में खेलने लगे। बकरी ने भी देखा की अब इनकी भूख शांत होगई हैं इसलिए उसे अपने मार्ग पे आगे बढ़ना चाहिए उसी समय शेर और शेरनी दोनो वापस लोट रहे थे । और आज भी उन्हें कोई शिकार नहीं मिला था। इसलिए शेर बकरी को देख के खुश होगया और उसकी और तेजी से दौड़ा। तभी दोनो बच्चे शेर और बकरी के बीच में आगए और उन्होंने शेर को बताया की कैसे बकरी ने उनकी भूख मिटाकर सहायता की हैं। इससे शेर और शेरनी बहुत खुश हुए और शेर ने बकरी को धन्यवाद दिया और उसकी सहायता के लिए उसे जंगल में कभी भी विचरण करने की आजादी दे दी। अब क्या था बकरी बहुत खुश हो गई और अब उसे जंगलबके शेर से डरने की जरूरत नहीं पड़ेगी। और अब बकरी कभी बच साथ और कभी सोए हुए शेर के बदन पर चढ़ती और उतरती। ये सब जंगल के बाकी जानवर भी देख रहे थे और अचंभित थे। और ये बात जंगल में आग की तरह फैल गई। सभी जानवरों को पता लगा की सहायता करने का फल कितना अच्छा व मीठा होता है उसी जंगल में एक चील भी रहती थी उसने भी ये बात सुनी और निश्चित किया की जब कभी भी उसको मौका मिलेगा तो वो भी सहायता करेगी। और एक दिन ऐसा समय आया की चील भोजन के लिए इधर उधर उड़ रही थी। उसने देखा की एक चूहा अपने परिवार के साथ एक दलदल में फंसा हुए हैं और बचने के लिए कोशिश कर रहा था लेकिन वो निकल नही पा रहें थे तभी चील ने सोचा की मौका भुनाने का यहीं सही समय हैं। और उनकी सहायता के लिए पहुंच गई। और उनको बारी बारी से सभी चूहों को दलदल से निकाल कर एक सुखी जगह पर रखा। तभी उसने देखा की चूहे ठंड के मारे तड़प रहे हैं। इसलिए उसने अपने पंख उनके ऊपर फैला कर बैठ गई। ताकि उनको गर्म करके आराम दे सके। और घंटे भर के बाद चील ने सोचा की अब चूहे आराम की स्थिति में आगए हैं इसलिए उसे अब चलना  चाहिए। जैसे ही चील ने उड़ने के लिए कोशिश की तो देखा की वो उड़ नहीं पा रहीं रही है। तभी उसने देखा की चूहों उसके पर कतर दिए हैं। इससे चील बहुत दुखी हुई और वो बकरी के पास गई और आपबीती सुनाई। तभी बकरी ने उसे बताया की सहायता करना गलत नही हैं पर आप जिसकी सहायता कर रहे हो वो उसकी वैल्यू करने में सक्षम हैं या नहीं यह जरूर आंकना चाहिए।।


"इसलिए सहायता करना गलत नहीं हैं पर जिसकी आप सहायता  कर रहे हो कभी वो चूहा तो नही हैं ये जरूर जांच ले अन्यथा कब आपके पंख कुतर देगा आपको पता भी नही चलेगा " Read More....

महात्मा ने भैंस चोरी

           सफलता की शुरुवात आराम की सीमा से होती हैं

बात बहुत पुरानी हैं। एकबार एक संतमहात्मा अपने शिष्य के साथ एक गांव से गुजर रहे थे दोपहर भी गुजरने वाला था । दोनों को बहुत तेज भूख लगी थी और थकान भी होने लगी थी। तभी पास में ही एक घर नजर आया । और दोनों घर के पास पहुंचे और दरवाजा खटखटाया। देखा की अंदर से फटे-पुराने कपड़े पहना एक आदमी बाहर आया । महात्मा ने उससे अपनी भूख की बात बताई और सवाल किया की कुछ खाने को मिल सकता है क्या? उस आदमी ने उन दोनों को अंदर आने को कहा और बैठा कर भोजन कराया । भोजन करते करते ही महात्मा ने कहा से उस आदमी से कहा की तुम्हारी जमीन बहुत उपजाऊ लग रही है, लेकिन फसलों को देखकर लगता है कि तुम खेत पर ज्यादा ध्यान ही नहीं देते। फिर तुम्हारा गुजारा कैसे होता है? आदमी ने उत्तर दिया- हमारे पास एक भैंस है, जो काफी दूध देती है। उसी से मेरा गुजर बसर हो जाता है। समय को देखते हुए रात होने लगी थी इसलिए महात्मा शिष्य सहित वहीं रुक जाने का निवेदन किया और उस व्यक्ति ने सहर्ष स्वीकार किया और रात्रि विश्राम के लिए वन्हीं पे रुक गए। मध्य रात्रि को उस महात्मा ने अपने शिष्य को उठाया और कहा- चलो हमें अभी ही यहां से निकलना होगा और इसकी भैंस भी हम साथ ले चलेंगे। ये बात सुनकर शिष्य चौंक गया और गुरु की बात उसे बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी लेकिन करता क्या ! दोनों भैंस को साथ लेकर चुपचाप निकल गए। यह बात उस शिष्य के मन में खटकती रही की गुरु ने उसकी भैंस चोरी करके अच्छा नहीं किया। समय बीतता गया और कुछ सालों के बाद एक दिन शिष्य उस आदमी से मिलने का मन बनाकर उसके गांव पहुंचा गया। जब शिष्य उस खेत के पास से गुजर रहा था तो देखा खाली पड़े खेत अब फलों के बगीचों में बदल चुके थे उसे यकीन नहीं आ रहा था ।तभी वह आदमी सामने दिख गया। शिष्य ने उसके पास जाकर उसे बताया की सालों पहले मैं अपने गुरु के साथ आपसे मिला था और आदमी ने शिष्य को आदर पूर्वक बिठाया और बताने लगा की उस दिन मेरी भैंस खो गई। पहले तो समझ में नहीं आया कि क्या करूं। फिर जंगल से लकड़ियां काटकर उन्हें बाजार में बचने लगा जिससे कुछ पैसे मिले तो मैंने बीज खरीद कर खेतों में बो दिए ।और फसल अच्छी होने लगी और मेरे पास कुछ पैसों की बचत होने लगी। और उसी से मैंने फलों के बगीचे लगाने में इस्तेमाल किया। और अब काम बहुत ही अच्छा चल रहा है। और इस समय मैं इस इलाके में फलों का सबसे बड़ा व्यापारी बन गया हूं। कभी-कभी सोचता हूं उस रात मेरी भैंस न खोती तो यह सब न होता । शिष्य ने उससे पूछा, यह काम आप पहले भी तो कर सकते थे? तब वह बोला, उस समय मेरी जिंदगी बिना मेहनत के चल रही थी। मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं इतना कुछ कर सकता हूं।। "इसलिए व्यक्ति की क्षमता असीमित है केवल पंख फैलाने की देरी होती हैं और पल भर में जीवन बदल जाता हैं इसलिए भगवान रूपी महात्मा के हाथो भैंस चोरी होने का इंतजार नहीं करना चाहिए" More Stories....

रविवार, 12 फ़रवरी 2023

बार्बर व राक्षस की कहानी

          आलसी बार्बर का खजाना



एक बार की बात हैं की गांव  में एक बार्बर रहता था । वह निहायती  आलसी किस्म का इंसान था। सारे  दिन वह आईने के सामने बैठा टूटे कंघे से बाल संवारते हुए गंवा देता था । उसकी  मां उसकी इस आदत से बहुत दुखी थी और उसे डाटती रहती थी पर उस आलसी के कानो पे जूं भी नही रेंगती थी । आखिरकार एक दिन मां ने गुस्से में उसकी ठुकाई कर दी। जवान बेटे ने मां के हाथो से पीटकर अपने आप को बहुत अपमानित महसूस किया और घर छोड़ कर चल दिया । और कसम खाई  कि जब तक कुछ कमा नहीं कर लेगा, वह घर नहीं लौटेगा। यह सोचते सोचते वह अब जंगल पहुंच चुका था । उसे और कोई काम तो आता नहीं था इसलिए अब वो भगवान के चरणों में कुछ अच्छा होने की कामना से बैठ गया। अभी वह प्रार्थना के लिए बैठा ही था की उसी समय एक राक्षस से सामना हो गया। राक्षस उसे देखकर  खुश हुआ और खुशी मनाने के लिए लिए नाचने लगा। यह देख बार्बर के होश उड़ गए,पर अपने डर को काबू में रखते हुए। उसने साहस बटोरा और राक्षस के साथ वह भी नाचने लगा।


कुछ देर बाद उसने राक्षस से पूछा- तुम क्यों नाच रहे हो? तुम्हें किस बात की खुशी है? राक्षस हंसते हुए बोला, मैं तुम्हारे सवाल का इंताज़ार कर रहा था। तुम तो निरे उल्लू हो। तुम समझ नहीं पाओगे। मैं इसलिए नाच रहा हूं कि मुझे तुम्हारा नरम-नरम मांस खाने को मिलेगा। तभी राक्षस ने बार्बर से पूछा की वैसे तुम क्यों नाच रहे हो ? तभी नाई ने विजयी हंसी के साथ कहा, मेरे पास नाचने का बढ़िया कारण है। हमारे राज्य के राजकुमार  एक खास बीमार  से पीड़ित है और वैद्यराज ने उसे 101 राक्षसों के दिल का खून पीने का उपचार बताया है। महाराज ने पूरे राज्य में यह घोषणा करवाई है जो कोई यह दवा लाकर देगा, उसे वे अपना आधा राज्य देंगे और उनकी सुंदर राजकुमारी से विवाह भी कर देंगे। मैंने सौ राक्षस तो पकड़ लिए थे। अब तुम भी मेरी पकड़ में आगाये हो। यह कहते हुए उसने जेब से छोटा आईना उसकी आंखों के सामने किया। आतंकित राक्षस ने आईने में अपनी शक्ल देखी। चांदनी रात में उसे अपना प्रतिबिम्ब साफ नज़र आया। उसे लगा कि वह वाकई उसकी मुट्ठी में है। थर-थर कांपते हुए उसने बार्बर से आग्रह किया कि उसे छोड़ दे, पर बार्बर कान्हा से मानने वाला था । तब राक्षस ने उसे महाराज से भी अधिक धन देने की बात कही पर इसके ऑफर में बार्बर ने  दिलचस्पी ना होने का नाटक करते हुए कहा- पर जिस धन का तुम वादा कर रहे हो, वह है कहां और इतनी रात में उस धन को और मुझे घर कौन पहुंचाएगा?


राक्षस ने कहा, खज़ाना तुम्हारे पीछे वाले पेड़ के नीचे गड़ा है। पहले तुम इसे अपनी आंखों से देख लो, फिर मैं तुम्हें और इस खज़ाने को पलक झपकाते ही तुम्हारे घर पहुंचा दूंगा। राक्षसों की शक्तियां तुमसे क्या छुपी है, कहने के साथ ही उसने पेड़ को जड़ समेत उखाड़ दिया और हीरे-मोतियों से भरे सोने के सात कलश बाहर निकाले । खज़ाने की चमक से नाई की आंखें चौंधिया गईं, पर अपनी भावनाओं को छुपाते हुए उसने रौब से उसे आदेश कि वह उसे और खज़ाने को उसके घर पहुंचा दे। राक्षस ने आदेश का पालन किया। राक्षस ने अपनी मुक्ति की याचना की, पर नाई उसकी सेवाओं से हाथ नहीं धोना चाहता था। इसलिए अगला काम फसल काटने का दे दिया। बेचारे राक्षस को यकीन था कि वह बार्बर के शिकंजे में है। सो उसे फसल तो काटनी ही पड़ेगी।


वह फसल काट ही रहा था कि वहां से दूसरा राक्षस गुजर रहा था । अपने दोस्त को इस हालत में देख वह पूछ बैठा। राक्षस ने उसे आपबीती बताई और कहा कि, इसके अलावा कोई चारा नहीं है। दूसरे ने हंसते हुए कहा, पागल हो गए हो? राक्षस आदमी से कहीं शक्तिशाली और श्रेष्ठ होते हैं। तुम उस आदमी का घर मुझे दिखा सकते हो? हाँ, दिखा दूंगा, पर दूर से। धान की कटाई पूरी किए बिना उसके पास जाने की मेरी हिम्मत नहीं है। यह कहकर उसने उसे बार्बर का घर दूर से दिखा दिया।


वहीं अपनी कामयाबी के लिए बार्बर ने भोज का आयोजन किया हुआ था । और एक बड़ी मछली भी लेकर आया। लेकिन एक बिल्ली टूटी खिड़की से रसोई में आकर ज्यादा मछली खा गई। गुस्से में बार्बर की पत्नी बिल्ली को मारने के लिए झपटी पर बिल्ली भाग गई। उसने सोचा की बिल्ली इसी रास्ते से वापस आएगी। इसलिए वह मछली काटने की छुरी थामे खिड़की के पास खड़ी हो गई। उधर दूसरा राक्षस दबे पांव बार्बर के घर की ओर बढ़ा। उसी टूटी हुई खिड़की से वह घुसा। बिल्ली की ताक में खड़ी बार्बर की पत्नी ने तेज़ी से चाकू का वार किया । निशाना सही नहीं बैठा, पर राक्षस की लम्बी नाक आगे से कट गई। दर्द से कराहते हुए वह भाग खड़ा हुआ। और शर्म के मारे अपने दोस्त के पास वो गया भी नहीं ।

पहले राक्षस ने धीरज के साथ पूरी फसल काटी और अपनी मुक्ति के लिए बार्बर के पास गया। धूर्त बार्बर ने इस बार उल्टा शीशा दिखाया। राक्षस ने बड़े गौर से देखा । उसमें अपनी छवि न पाकर उसने राहत की सांस ली और नाचता-गुनगुनाता चला गया। More Stories...

राजा का जंगल में विश्राम की कहानी

 ! राजा का वनवासी को इनाम !



एक बार की बात हैं की एक राजा जंगल में  शिकार का पीछा करते-करते राह भटक गया, जंगल बहुत ही घनघोर था। रास्ता साफ नहीं दिख पड़ता था। ऐसे में  रात हो गई और जंगल के हिंसक पशु की डरावनी आवाजे सुनाई देने लगी। राजा जंगली जानवरों से बचने के लिए  और रात्रि बिताने के लिए किसी आश्रय की तलाश करने लगा। पर घना जंगल होने के कारण उसको कुछ भी दिखाई नही दे रहा था तभी उसको एक उपाय सूझा और वो एक लंबे पेड़ पर चढ़कर देखा तो पूर्व दिशा में किसी झोंपड़ी से रोशनी  दिखाई दि और  राजा उसी दिशा में चल पड़ा और किसी वनवासी की झोपड़ी में जा पहुँचा।

राजा ने अपने आप को एक राहगीर बताते हुए उस व्यक्ति से एक रात बिताने के लिए लेने देने की प्रार्थना की। वनवासी बडे दिल वाला था, उसने प्रसन्नता पूर्वक ठहराया और घर में जो कुछ खाने को था देकर उसकी भूख बुझाई | स्वयं जमीन पर सोया और राजा को मेहमान मानकर अपनी चारपाई दे दी। राजा ने खाना खा कर  भूख बुझाई और थकान मिटाई और गहरी नींद सोया गया।

राजा वनवासी की सहयोग पर मन ही मन बहुत प्रसन्न था । सवेरा होने पर उस वनवासी ने राजा को  सही रास्ते वी दिशा बताई और राजा ने उस वनवासी से बिदाई ली व  दोनों एक दूसरे से अलग अलग होने लगे। तो राजा को उस वनवासी का आतिथ्य का बदला चुकाने का मन आया परन्तु क्या दे? क्योंकि राजा को पता था की यह व्यक्ति अकेला रहता हैं कोई भी कीमती वस्तु इसके पास डाकू लुटेरे रहने नहीं देंगे इसलिए इसको कुछ ऐसा इनाम दिया जाए ताकि वो इसके पास सुरक्षित रह सके और जरूरत के अनुसार वो इस इनाम को अपने काम में ले सके।


उसी जंगल में राजा का एक विशाल चंदन का बाग था, उसमें चंदन के सैकड़ों पेड़ थे। राजा ने अपना पूरा परिचय उस व्यक्ति  को दिया और अपने हाथ से लिखकर उसे चंदन उद्यान का मालिक बना दिया। वनवासी भी इससे बहुत खुश हुआ।


वनवासी लकड़ी बेचकर गुजारा करता था। इसने लकड़ी का कोयला बना कर बेचने में कम मेहनत  तथा अधिक पैसा मिलने की जानकारी प्राप्त कर ली थी। और कोयला बना कर बेचने लगा । पेड़ अच्छे और बड़े थे। आसानी से कोयला बनने लगा। उसने एक के बजाय दो फेरे  नगर में लगाने शुरू कर दीये ताकि आमदनी दुगनी होने लगे । इससे वनवासी बहुत प्रसन्न था। अधिक कमाई होने पर उसने अधिक सुविधा को चीज वस्तु खरीदनी शुरू कर दी और अधिक आराम व मस्ती से रहने लगा। कुछ समय बाद चंदन का बाग  कोयला बन गया। अब मात्र एक ही पेड़ बचा था की एक दिन वर्षा होने से कोयला तो न बन सका । कुछ प्राप्त करने के लिए पेड़ से एक डाली काटी और उसे ही लेकर नगर गया। लकड़ी में से भारी सुगंध आ रही थी। खरीददारों ने समझ लिया यह चंदन है। कोयले की तुलना में दस गुना अधिक पैसा मिला। सभी उस लकड़ी की माँग करने लगे। कहा कि भीगी लकड़ी के कुछ कम दाम मिले हैं। सूखी होने पर उसकी और भी अधिक कीमत देंगे।वनवासी पैसे लेकर लौटा और मन ही मन विचार करने लगा। यह लकड़ी तो बहुत कीमती है। मैंने इसके कोयले बनाकर बेचने की भारी भूल की, यदि लकड़ी काटता बेचता रहता तो कितना धनाढ्य बन जाता और इतनी सम्पदा इकट्ठी कर लेता जो पीढ़ियों तक काम देती।


अब राजा के पास जाकर दुबारा मांगना तो उसे लगा की मूर्खता होगी तथा अब शरीर भी बुड्ढा हो गया था। कुछ अधिक पुरुषार्थ करने का उत्साह नहीं था। झाड़ियाँ काटकर कोयले बनाने और पेट पालने की वही पुरानी प्रक्रिया अपना ली और जैसे-तैसे गुजारा करने लगा। इसलिए जीवन निश्चित ही चंदन वन हैं इसकी हर टहनी बहुत कीमती है। इसे अज्ञानी बने रह कर कोयला नही बनाना चाहिए।। More Stories....

मंगलवार, 31 जनवरी 2023

नगर सेठ की कहानी- A Story of shroff/sheth

   नगर सेठ की कहानी- A Story of shroff/sheth

      ये कहानी एक नगर सेठ की है । जिसका नाम दौलतराम था ।समय के साथ उसका कारोबार बढ़ नहीं रहा था और साथ साथ में कारोबार में आवश्यक पूंजी की कमी हो रही थी व प्रतिस्पर्धा भी अपने पैर फैला रही थी । कई दिनों से सेठ इस चिंता से दुखी था तभी उसे ख्याल आया की उसके नगर में एक फौजी है जो की देश की आर्मी में सेवा दे रहा है ।उसके परिवार में अभीअधिक खर्चा नहीं होता था और उसके ज़मीन में भी अच्छी पैदावार होती थी इसलिए उससे यदि रुपया लेके कारोबार में लगाया जाये तो उसका कारोबार बनेगा । 

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इसी भाव से एक दिन वो फौजी के घर गया 

और उसने अपनी बात बताई । फौजी ने भी सोचा की उसके खर्चे अधिक नहीं है और आमदनी अधिक है तो यदि में सेठ को कारोबार के लिए पूंजी दे देता हु तो मुझे भी मेरी पूंजी में वृद्धि होगी और उसने सेठ से मुनाफे में 50% भागीदारी के लिए कहा और सेठ ने हॅसते हुए मान लिया और फौजी ने उसे तय राशि व्यवसाय के दे दी और सेठ ने व्यवसाय मे पूँजी को लगाया और समय के साथ कारोबार में अच्छी खासी वृद्धि होने लगी । दोनों बड़े ख़ुशी खुशी जीवन जी रहे थे । एक दिन फौजी को समाचार मिला की दुश्मन देश से उनकी लड़ाई शुरू हो गई है इसलिए उसे लड़ाई की पोस्ट पे पहुंचना है समाचार मिलते ही फौजी जो की सेना में घुड़सवार था । और पुराने समय में लड़ाई ऊंट घोड़े हाथियों पे या पैदल ही लड़ी जाती थी । पुराने समय की लड़ाई मे हथियारों के तौर पे तलवार,भाला व तीर बाण काम में लिए जाते इसलिए फौजी भी तलवार के साथ घोड़ी पे बैठ के साथियो के साथ राज्य की रक्षा का भाव लिये लड़ाई के मैदान मे कूद गया। लड़ाई के दौरान फौजी ने देखा की उसकी घोड़ी साथी सैनिको के दल से निकल कर दुश्मन के इलाके मे दाखिल हो रही हैं । 

इस खतरे को भांपते 

हुये फौजी ने घोड़ी की लगाम को कस कर वापस साथी सैनिको के साथ युध्द निती अनुसार युध्द करने लगा। लेकिन वो घोड़ी बार बार दुश्मन के अन्दर जरूरत से अधिक अन्दर तक जा रही थी। ऐसा जब 3-4 बार घटित हुआ तो अंतत फौजी शत्रु के हाथो वीरगति को प्राप्त हो गया। जैसे ही ये बात आग की तरह राज्य मे फैल गई और जैसे ही ये समाचर सेठ को मिला तो उसको बहुत दुख हुआ पर फौजी के घर पर केवल अब उसकी पत्नि ही थी । फौजी के कोई संतान नही थी। इन सब को देखते हुये सेठ के मन मे भाव जागा की अब फौजी तो इस दुनिया मे नही रहा तो अब मुझे मुनाफे मे से हिसा नही देना होगा और ना ही फौजी से ली हुई पूँजी उसको लोटानी होगी। ऐसे ही कुछ समय निकला गया और एक दिन सेठ के घर मे खुशी का आगमन हुआ और सेठानी ने एक लड़के को जन्म दिया। इससे सेठ के घर परिवार मे खुशी की लहर दोड़ पड़ी । और सेठ ने सभी नगर वासियो के लिये भोज करवाया और दान पुण्य किया। समय के साथ सेठ का लड़का भी बड़ा होता गया और सेठ ने उसकी परवरिश व पढ़ाई पे अच्छा पैसा खर्च किया और पढ़ाई भी विलायक से करवा फिर एक सुन्दर लड़की से उसका विवाह कराया। सेठ इन सब से मन ही मन बहुत खुश होता की फौजी होता तो उसके हिस्से का मुनाफे उसको शेयर करना पड़ता । 

सेठ के लड़के की शादी

 के कुछ महिने ही बीते थे की एक दिन उनका लड़का अचानक से बीमार हो गया। सेठ ने उसे बड़े से बड़े डॉक्टर से इलाज कराया और खुब पैसा खर्च किया लेकिन उसके स्वास्थ मे कोई सुधार नही हो रहा था। फिर एक दिन डॉक्टर ने सेठ को बुलाया और बताया की अब उसका लड़का थोडे दिन ही जीवित रहेगा इसलिये उसकी घर पर ही सेवा करे । यह बात सुनकर सेठ बहुत अधिक दुखी हो गया। और अपने लड़के को साथ लेके नगर वापस आ गया। तभी एक दिन नगर के एक वैद्य ने सेठ से कहा की नगर के पास पहाड़ी के पास हनुमान जी का मंदिर हैं वहा पे एक बुजुर्ग महात्मा जी रहते है और लोग अपने लिये दुवा माँगने वँहा पे जाते है क्यो ना आप भी अपने जवान लड़के को दर्शन के वँहा लेके जाओ।। सेठ ने अगले दिन सुबह सुबह उस मन्दिर के दर्शन के लिये पहुंच गये। पहुंच कर हनुमान जी के दर्शन किये और महात्मा जी चरणो मे पहुंचे।। महात्मा जी ने नगर सेठ को पहचान लिया। तभी नगर सेठ ने महात्मा से सवाल किया की हे सिद्ध पुरुष मुझे बताये की मेरे जीवन मे ये मुसीबत क्यों आई। तो महात्मा ने बड़े शालीनता से जवाब दिया की 

सेठ ये सब दुसरे के हिस्से का अपना बनाने के कारण हुआ। 

सेठ ने कहा की उसने ऐसा नही किया तब महात्मा ने कहा जब तुम्हारे मन मे फौजी के पैसो के नही लौटाने का भाव पैदा हुया तभी तुम भुल गये की धरती का नियम हैं जो जिसका हैं वो उसी को मिलेगा। और तुम जिसे अपना बेटा समझ रहे हो ये वही फौजी हैं जिसने तुम्हारे घर मे पुनर्जन्म लिया हैं । और इसने अपने हिस्से का पुरा वसूल कर लिया हैं और तुम उसी इस्थथी मे पहुंच चुके हो।। यह बात सुनकर सेठ अचंभित होगया और उसने इस बात को दिल से सच माना लेकिन तभी सेठ ने महात्मा से सवाल किया की मेरा ये दोष है लेकिन इसकी पत्नी का क्या दोष है तब महात्मा ने कहा की ये पत्नी ही वो घोड़ी थी जिसने इसे दुश्मन के इलाके मे धकेला था। इसलिये गलत करने से ही नही होता गलत करने के भाव से भी पाप हो जाता है जैसा सेठ के साथ हुया। इसलिये ये मान के चलिये जिसका हिस्सा हैं वो उसको मिल जायेगा।।।

आपको ये कहानी कैसी लगी कमेंट करके बताएं ताकी मुझे और प्रेरणादायक कहानियाँ लिखने मे सहायक हो ।। Read More Story....

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

पक्षी-जारोवर की कहानी

                                      कहानी-Surprising Science for Human beings

 

  कुड़कुड़ाना... इसका क्या मतलब है? परिघटना जब प्रवास में पक्षियों के विशाल झुंड आकार-परिवर्तनशील उड़ान पैटर्न बनाते हैं, तो इसे मुरमुरेशन के रूप में जाना जाता है। निहारना वास्तव में आश्चर्यजनक आश्चर्य है। तो आइए देखते हैं यह सब वीडियो में होता है। क्लिप में लगभग 50 सेकंड में घटना अभूतपूर्व हो जाती है। यहाँ, आप ज़ारोवर पक्षी को विभिन्न रूपों में उड़ते हुए देखते हैं। वैज्ञानिकों ने यह पता लगाने की कोशिश की कि वे एक दूसरे से टकराए बिना इस तरह कैसे उड़ते हैं और निष्कर्ष निकाला कि यह तभी संभव है जब प्रत्येक पक्षी एक सेकंड में लगभग 100 मिलियन गणितीय गणना कर सके ताकि एक दूसरे से टकराए नहीं। प्रकृति की सबसे बड़ी और सबसे क्षणभंगुर घटनाओं में से एक। प्रकृति हमें विस्मित करना कभी बंद नहीं करती।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

तिल गूड़ के लड्डू की कहानी

                                                          कहानी-Story with Health tips
 

 
 
ये कहानी है  एक गुरुकुल की जब वँहा पे गुरु अपने शिष्य को आशीर्वाद दे रहे थे कि थोड़ी ही दूर पर आपस में लड़ते दो स्टूडेंट की आवाज उन्हें सुनाई दी। उन्हें हॉस्टल में आए अधिक समय नहीं हुआ था |


गुरु ने उनके पास पहुंचकर उन्होंने पूछा- क्या बात है? क्यों झगड़ रहे हो तुम दोनों?
एक ने बोला- गुरुजी! आज मकर संक्रांति के दिन मैं आपको तिल के लड्डू खिलाना चाहता था। लेकिन मेरा यह सहपाठी कहता है कि पहले मैं खिलाऊंगा। जब विचार पहले मेरे मन में आया है तो मुझे पहले खिलाने का अधिकार है। लेकिन यह बेईमानी कर रहा है। इसे मुझसे ईर्ष्या है। आप ही बताएं कि उचित क्या है?
 गुरुजी बोले- बच्चों! मैं तुम दोनों की भावना समझता हूं। लेकिन तुम्हारी भावना में अभी इस त्योहार की सच्ची भावना सम्मिलित नहीं है। इसलिए तुम आपस में झगड़ रहे हो। मकर संक्रांति के दिन तिल के लड्डू इसी भाव से खिलाए जाते हैं कि हमारे बीच जो भी मतभेद या मनभेद हैं।वे नष्ट हों और हम बैर भाव भुलाकर मीठा-मीठा बोलें। इसलिए लड्डू देते वक्त हम कहते हैं- 'तिळ गुळ घ्या आणि गोड गोड बोला' यानी 'तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो।' और तुम कितना मीठा बोल रहे हो, यह तुम स्वयं निर्णय करो। अतः मकर संक्रांति के सच्चे भाव को आत्मसात करते हुए पहले मुझे नहीं एक-दूसरे को तिल के लड्डू खिलाओ। गुरु की बात सुनकर शिष्यों ने उनके कहे का अनुसरण किया और एक-दूसरे को सच्चे हृदय से लड्डू खिलाने के बाद गले लगा लिया।क्या बात है! कितना अनोखा अंदाज था गुरु का अपने शिष्यों को सिखाने का। वे न केवल अपने शिष्यों को सिखा गए बल्कि आज भी हम जैसे लोगों को सिखा रहे हैं। तो मकर संक्रांति पर आपसे भी एक आग्रह है कि आज जब आप काम पर जाएं तो तिल के लड्डू साथ ले जाएं और सभी स्नेहीजनों के साथ ही उस सहकर्मी को अवश्य खिलाएं जिसके साथ आजकल आपकी पटरी नहीं बैठ रही है। हां, शर्त यह है कि भाव भी शुद्ध होना चाहिए। लड्डू खिलाने के साथ ही आज से उससे मीठी-मीठी बातें भी करना शुरू कर दें। कुछ समय बाद निश्चित ही आपको चमत्कारिक परिणाम मिलने लगेंगे और आपके दफ्तर की हवा भी बदलेगी। लेकिन याद रहे कि आप अपनी इस सफलता पर फूल मत जाना। वरना वही होगा जो पतंग और गुब्बारे के साथ होता है। यही है आज का गुरुमंत्र।

 

गुरुवार, 12 जनवरी 2023

मकर-संक्रांति 2023

                      कहानी-मकर-संक्रांति का तिल व गूड़ का संबंद्ध की पौराणिक कहानी



 

 

किसी भी साल की भांति 2023 का पहला पर्व मकर संक्रांति (Makar Sankranti 2023) का पड़ रहा है. देशभर में इस पर्व को बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है. मकर संक्रांति का ज्योतिषी रूप से भी बहुत महत्व है. कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए इसे मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. सूर्य 30 दिन में राशि बदलते हैं और 6 माह में उत्तरायण और दक्षिणायन होते हैं. मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं. मकर संक्रांति 14 जनवरी, शुक्रवार के। 

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का पर्व देशभर के अलग-अलग भागों में अलग तरीके और अलग नाम से मनाया जाता है. लेकिन सब जगह एक बार कॉमन यह है कि इस दिन तिल-गुड़ खाना और इसका दान करना शुभ माना जाता है. सदियों से इस दिन काले तिल के लड्डू खाने की परंपरा चली आ रही है. लेकिन क्या आप इसके पूछी की वजह जानते हैं? आइए जानते हैं इस दिन काले लड्डू क्यों बनाए और खाए जाते। काले तिल जो हैं वो शनि का रुप होते हैं व गूड़ सुर्य का प्रतिनिधित्व करता है ।इसलिए इस दिन तिल व गुड के लडू खाना व दान करना पसंद करते है । जिससे शनि की दशा को ठिक रखा जा सके।।

तिल व गुड की कहानी 

पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य देव ने अपने बेटे शनि देव का घर कुंभ क्रोध में जला दिया था. कुंभ राशि के स्वामी शनि हैं और इस राशि को ही उनका घर माना जाता है. घर को जलाने के बाद जब सूर्य देव घर देखने पहुंचे, तो काले तिल के अलावा सब कुछ जलकर राख हो गया था. तब शनि देव ने सूर्य देव का स्वागत उसी काले तिल से किया. 

चुंबकयुक्त उत्पादों के प्रयोग मात्र से गहन बीमारीयां छुमंतर

केवल सोने पानी पीने और हाथ की कलाई पर मैग्नेटिक ब्रासलेट पहनने से रोगों से चमत्कारी मुक्ति की सचाई             चुम्बकीय चिकित्सा हर आयु के न...