मंगलवार, 31 जनवरी 2023

नगर सेठ की कहानी- A Story of shroff/sheth

   नगर सेठ की कहानी- A Story of shroff/sheth

      ये कहानी एक नगर सेठ की है । जिसका नाम दौलतराम था ।समय के साथ उसका कारोबार बढ़ नहीं रहा था और साथ साथ में कारोबार में आवश्यक पूंजी की कमी हो रही थी व प्रतिस्पर्धा भी अपने पैर फैला रही थी । कई दिनों से सेठ इस चिंता से दुखी था तभी उसे ख्याल आया की उसके नगर में एक फौजी है जो की देश की आर्मी में सेवा दे रहा है ।उसके परिवार में अभीअधिक खर्चा नहीं होता था और उसके ज़मीन में भी अच्छी पैदावार होती थी इसलिए उससे यदि रुपया लेके कारोबार में लगाया जाये तो उसका कारोबार बनेगा । 

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इसी भाव से एक दिन वो फौजी के घर गया 

और उसने अपनी बात बताई । फौजी ने भी सोचा की उसके खर्चे अधिक नहीं है और आमदनी अधिक है तो यदि में सेठ को कारोबार के लिए पूंजी दे देता हु तो मुझे भी मेरी पूंजी में वृद्धि होगी और उसने सेठ से मुनाफे में 50% भागीदारी के लिए कहा और सेठ ने हॅसते हुए मान लिया और फौजी ने उसे तय राशि व्यवसाय के दे दी और सेठ ने व्यवसाय मे पूँजी को लगाया और समय के साथ कारोबार में अच्छी खासी वृद्धि होने लगी । दोनों बड़े ख़ुशी खुशी जीवन जी रहे थे । एक दिन फौजी को समाचार मिला की दुश्मन देश से उनकी लड़ाई शुरू हो गई है इसलिए उसे लड़ाई की पोस्ट पे पहुंचना है समाचार मिलते ही फौजी जो की सेना में घुड़सवार था । और पुराने समय में लड़ाई ऊंट घोड़े हाथियों पे या पैदल ही लड़ी जाती थी । पुराने समय की लड़ाई मे हथियारों के तौर पे तलवार,भाला व तीर बाण काम में लिए जाते इसलिए फौजी भी तलवार के साथ घोड़ी पे बैठ के साथियो के साथ राज्य की रक्षा का भाव लिये लड़ाई के मैदान मे कूद गया। लड़ाई के दौरान फौजी ने देखा की उसकी घोड़ी साथी सैनिको के दल से निकल कर दुश्मन के इलाके मे दाखिल हो रही हैं । 

इस खतरे को भांपते 

हुये फौजी ने घोड़ी की लगाम को कस कर वापस साथी सैनिको के साथ युध्द निती अनुसार युध्द करने लगा। लेकिन वो घोड़ी बार बार दुश्मन के अन्दर जरूरत से अधिक अन्दर तक जा रही थी। ऐसा जब 3-4 बार घटित हुआ तो अंतत फौजी शत्रु के हाथो वीरगति को प्राप्त हो गया। जैसे ही ये बात आग की तरह राज्य मे फैल गई और जैसे ही ये समाचर सेठ को मिला तो उसको बहुत दुख हुआ पर फौजी के घर पर केवल अब उसकी पत्नि ही थी । फौजी के कोई संतान नही थी। इन सब को देखते हुये सेठ के मन मे भाव जागा की अब फौजी तो इस दुनिया मे नही रहा तो अब मुझे मुनाफे मे से हिसा नही देना होगा और ना ही फौजी से ली हुई पूँजी उसको लोटानी होगी। ऐसे ही कुछ समय निकला गया और एक दिन सेठ के घर मे खुशी का आगमन हुआ और सेठानी ने एक लड़के को जन्म दिया। इससे सेठ के घर परिवार मे खुशी की लहर दोड़ पड़ी । और सेठ ने सभी नगर वासियो के लिये भोज करवाया और दान पुण्य किया। समय के साथ सेठ का लड़का भी बड़ा होता गया और सेठ ने उसकी परवरिश व पढ़ाई पे अच्छा पैसा खर्च किया और पढ़ाई भी विलायक से करवा फिर एक सुन्दर लड़की से उसका विवाह कराया। सेठ इन सब से मन ही मन बहुत खुश होता की फौजी होता तो उसके हिस्से का मुनाफे उसको शेयर करना पड़ता । 

सेठ के लड़के की शादी

 के कुछ महिने ही बीते थे की एक दिन उनका लड़का अचानक से बीमार हो गया। सेठ ने उसे बड़े से बड़े डॉक्टर से इलाज कराया और खुब पैसा खर्च किया लेकिन उसके स्वास्थ मे कोई सुधार नही हो रहा था। फिर एक दिन डॉक्टर ने सेठ को बुलाया और बताया की अब उसका लड़का थोडे दिन ही जीवित रहेगा इसलिये उसकी घर पर ही सेवा करे । यह बात सुनकर सेठ बहुत अधिक दुखी हो गया। और अपने लड़के को साथ लेके नगर वापस आ गया। तभी एक दिन नगर के एक वैद्य ने सेठ से कहा की नगर के पास पहाड़ी के पास हनुमान जी का मंदिर हैं वहा पे एक बुजुर्ग महात्मा जी रहते है और लोग अपने लिये दुवा माँगने वँहा पे जाते है क्यो ना आप भी अपने जवान लड़के को दर्शन के वँहा लेके जाओ।। सेठ ने अगले दिन सुबह सुबह उस मन्दिर के दर्शन के लिये पहुंच गये। पहुंच कर हनुमान जी के दर्शन किये और महात्मा जी चरणो मे पहुंचे।। महात्मा जी ने नगर सेठ को पहचान लिया। तभी नगर सेठ ने महात्मा से सवाल किया की हे सिद्ध पुरुष मुझे बताये की मेरे जीवन मे ये मुसीबत क्यों आई। तो महात्मा ने बड़े शालीनता से जवाब दिया की 

सेठ ये सब दुसरे के हिस्से का अपना बनाने के कारण हुआ। 

सेठ ने कहा की उसने ऐसा नही किया तब महात्मा ने कहा जब तुम्हारे मन मे फौजी के पैसो के नही लौटाने का भाव पैदा हुया तभी तुम भुल गये की धरती का नियम हैं जो जिसका हैं वो उसी को मिलेगा। और तुम जिसे अपना बेटा समझ रहे हो ये वही फौजी हैं जिसने तुम्हारे घर मे पुनर्जन्म लिया हैं । और इसने अपने हिस्से का पुरा वसूल कर लिया हैं और तुम उसी इस्थथी मे पहुंच चुके हो।। यह बात सुनकर सेठ अचंभित होगया और उसने इस बात को दिल से सच माना लेकिन तभी सेठ ने महात्मा से सवाल किया की मेरा ये दोष है लेकिन इसकी पत्नी का क्या दोष है तब महात्मा ने कहा की ये पत्नी ही वो घोड़ी थी जिसने इसे दुश्मन के इलाके मे धकेला था। इसलिये गलत करने से ही नही होता गलत करने के भाव से भी पाप हो जाता है जैसा सेठ के साथ हुया। इसलिये ये मान के चलिये जिसका हिस्सा हैं वो उसको मिल जायेगा।।।

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